राजपूताना से "राजस्थान" बनने की कहानी

भारत की आजादी के साथ ही ब्रिटिश सरकार की देशी रियासतों पर सर्वोच्चता समाप्त हो गई।
● अब देशी रियासतों के राजाओं के पास भारत या पाकिस्तान किसी एक देश में अपनी रियासत को समिल्लित करने का विकल्प था या वे अपना पृथक अस्तित्व बनाये रख सकते थे।
● राजपूताना(वर्तमान राजस्थान) की समस्त रियासतों में हिन्दू बहुल जनसंख्या थी।
● टोंक एवं पालनपुर ही ऐसी रियासते थी जिनमे मुस्लिम शासक थे।
● भारत के विभाजन के पश्चात देश में 562 रियासते रह गए।
● छोटी-बड़ी रियासतों के शासकों की महत्वकाँक्षाये देश की अखंडता के लिए खतरा बन रही थी।
● ऐसे में लार्ड माउंटबेटन, नेहरू जी,सरदार पटेल जी और वी.पी.मेनन देशी रियासतों के शासकों की समस्याओं को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
● तब देशी राजा नरेंद्र मंडल के रूप में संगठित थे।
● आज बात करेंगे "राजपूताना" की जो देशी रियासतो के एकीकरण के बाद "राजस्थान" कहलाया।

                    1.भोपाल नवाब का पाकिस्तान की ओर झुकाव-: 
● नरेन्द्र मंडल के तत्कालीन अध्यक्ष भोपाल के नवाब हमीदुल्ला खाँ ने राजपूताने की रियासतो को पाकिस्तान में मिलने के लिए प्रेरित किया।
● भोपाल नवाब चाहता था कि यदि राजपूताने की रियासतो का एक क्रम पाकिस्तान में मिल जाएं तो भोपाल को भी पाकिस्तान में मिलाया जा सकता है।
● राजपूताने के बीकानेर और उदयपुर ने प्रारंभ से भारत संघ में मिलने का निर्णय लिया जिससे भोपाल नवाब के प्रयासों को नकार दिया।
● कांग्रेस देशी रियासतों के प्रति कठोर नीति का प्रदर्शन कर रही थी तो दूसरी ओर मुस्लिम लीग ने ठीक इसके विपरीत, बड़ा ही मुलायम रवैया अपनाया।
● मोहम्मद अली जिन्ना यह प्रयास कर रहा था कि ज्यादा से ज्यादा देशी रियासतों को पाकिस्तान में मिलाया जाएं। जिससे भारतीय संघ कमजोर बने।
● भोपाल नवाब जिन्ना की इस योजना में शामिल हो गया। 
● भोपाल नवाब चाहता था कि उसे भोपाल से कराची तक के मार्ग में आने वाली रियासतो का एक समूह बन जाएं और यह समूह पाकिस्तान में मिल जाएं।
● भोपाल नवाब और जिन्ना की योजना थी कि बड़ौदा,इंदौर, भोपाल,उदयपुर,जोधपुर और जैसलमेर रियासतो द्वारा शासित प्रदेश पाकिस्तान का अंग बन जाएं।
● उनकी इस योजना में सबसे बड़ी बाधा बड़ौदा और उदयपुर की और से उपस्थित हो सकती थी।
● हमीदुल्ला खाँ ने धौलपुर नरेश महाराज राणा उदयभान सिंह को भी इस योजना में शामिल कर लिया।
2. भारतीय रियासती विभाग एवं नरेंद्र मंडल सम्मेलन-:
● 25 जून 1947 को भारत की अंतरिम सरकार ने निर्णय लिया की एक नये रियासती विभाग का गठन किया जाएं।
● 5 जुलाई 1947 को सरदार पटेल के नेतृत्व में रियासती विभाग गठित किया गया तथा वी.पी.मेनन को इसका सलाहकार व सचिव नियुक्त किया गया।
● सरदार पटेल ने राजाओं के नाम एक वक्तव्य प्रकाशित कराया जिसमे ये अपील की गई की देशी रियासतों का विलय भारत संघ में किया जाएं।
● पटेल ने देशी रियासतों से अपील की 15 अगस्त 1947 से पूर्व भारत संघ में शामिल हो जाये।
● बीकानेर नरेश सार्दुलसिंह ने सरदार पटेल की इस घोषणा का तुरंत स्वागत किया और बीकानेर नरेश ने राजपूताना के राजाओं से अनुरोध किया कि मित्रता के आगे बढ़े हाथ को थाम ले।

● नरेंद्र मंडल सम्मेलन, दिल्ली
माउंटबेटेन ने 25 जुलाई 1947 को दिल्ली में नरेंद्र मंडल का एक अधिवेशन बुलाया।
● माउंटबेटेन ने देशी राज्यो के समामेलन के लिए दो प्रकार के प्रपत्र तैयार करवाये।
                               नरेंद्र मंडल फोटो सोर्स-:(विकिपीडिया)

1.) इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन-: यह एक प्रकार 
मिलाप पत्र था जिस पर हस्ताक्षर करके कोई भी राजा भारतीय संघ में शामिल हो सकता था।

2.) स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट-: यह एक सहमति पत्र था जिससे यथास्थिति बनी रहेगी।
                                    
● देशी राजाओं को समझ आ गया कि या तो अपना अस्तित्व हमेशा के लिए खो दो या किसी तरह सम्मानजनक तरीके से अपनी कुछ सम्पति एवं अधिकारों को जीवित रखो।

                        3. राजस्थान की रियासतों का एकीकरण-:

●  स्वतंत्रता के समय राजस्थान में 19 
 रियासतें, 3 ठिकाने तथा 1 केंद्रशासित प्रदेश था।
● रियासतें-: जयपुर,उदयपुर,जोधपुर,बीकानेर,बूंदी,कोटा, अलवर,भरतपुर,धौलपुर,डूंगरपुर,प्रतापगढ़, बासँवाड़ा,झालावाड़,करौली,शाहपुरा,सिरोही,टोंक,जैसलमेर,किशनगढ़।
● ठिकाने-: कुशलगढ़,लावा,नीमराणा।
● केंद्रशासित प्रदेश-: अजमेर-मेरवाड़ा।

राजस्थान का एकीकरण 7 चरणों में हुआ प्रत्येक चरण में अलग-अलग रियासतों का विलय होता गया और राजपूताना से राजस्थान अस्तित्व में आने लगा।
                            "राजपूताना"-फोटो सोर्स-:(विकिपीडिया)


प्रथम चरण- मत्स्य संघ(17 मार्च, 1948)-:
● रियासते और ठिकाने-: अलवर, भरतपुर, धौलपुर व करौली और चीफशिप नीमराणा को को मिलाकर मत्स्य संघ का निर्माण किया।
● राजधानी-: अलवर
● राजप्रमुख-: धौलपुर महाराजा उदयभानसिंह 
● उपराजप्रमुख-: करौली महाराज गणेशपाल                             सिंह।
● प्रधानमंत्री-: शोभाराम कुमावत।
● क्षेत्रफल व जनसँख्या-: 12000 वर्ग कि.मी व                               18.38 लाख।
● नामकरण-: के.एम. मुंशी।


द्वितीय चरण-'राजस्थान संघ'(25 मार्च, 1948)-:
● रियासतें और ठिकाने-: बांसवाड़ा, बूंदी,डूंगरपुर,झालावाड़,कोटा, प्रतापगढ़,टोंक,किशनगढ़,शाहपुरा और चीफशिप कुशलगढ़।
● राजधानी-: कोटा।
● राजप्रमुख-: कोटा के महाराव भीमसिंह
● उपराजप्रमुख-: बूंदी महाराज बहादुरसिंह
● प्रधानमंत्री-: प्रो. गोकुललाल असावा
● क्षेत्रफल व जनसँख्या-: 16807 वर्ग कि.मी और 23 लाख।

● तृतीय चरण-' संयुक्त राजस्थान'( 18 अप्रैल 1948)-:
● राजस्थान संघ में उदयपुर रियासत का विलय कर संयुक्त राजस्थान का निर्माण हुआ।
● राजधानी-: उदयपुर।
● राजप्रमुख-: मेवाड़ महाराणा भोपाल सिंह।
● उपराजप्रमुख-: कोटा महाराव भीमसिंह।
● प्रधानमंत्री-: माणिक्यलाल वर्मा।
● उद्घाटन-: जवाहरलाल नेहरू।
● क्षेत्रफल-: 27977 वर्ग मील और 4260918

● चतुर्थ चरण-'वृहत राजस्थान'(30 मार्च 1949)-:
●  रियासते व ठिकाने-:  संयुक्त राजस्थान का में जयपुर,जोधपुर,बीकानेर और जैसलमेर रियासतों का विलय कर वृहत राजस्थान का निर्माण किया गया एवं बाद में लावा चीफशिप को जयपुर में मिला दिया गया।
● राजधानी-: जयपुर
● राजप्रमुख-: महाराजा सवाई मानसिंह
● महाराजप्रमुख-: महाराणा भोपाल सिंह
● उपराजप्रमुख-: महाराव भीमसिंह
● प्रधानमंत्री-: हीरालाल शास्त्री।
● वृहत राजस्थान के निर्माण पर आज भी प्रत्येक 30 मार्च राजस्थान दिवस के रूप में मनाया गया।

● पंचम चरण-'संयुक्त वृहत्तर राजस्थान'(15 मई 1949)-: 
● रियासतें-: मेवो का उपद्रव बढ़ता जा रहा था। भरतपुर और धौलपुर रियासतें राजस्थान में विलय नही होना चाहती थी। ये रियासतें  अपना अलग अस्तित्व चाहती थी। धौलपुर के शासक ने प्रजा की इच्छानुसार निर्णय लेनी की बात की। बाद में शंकर राव समिति गठित की गई जिसने निर्णय दिया की भरतपुर और धौलपुर की जनता राजस्थान में विलय चाहती है।
● मत्स्य संघ का विलय वृहत्तर राजस्थान में कर "संयुक्त-वृहत्तर राजस्थान" का निर्माण किया गया।
● राजधानी-: जयपुर
● महाराजप्रमुख-: मेवाड़ महाराणा भोपालसिंह
● राजप्रमुख-: जयपुर महाराजा मानसिंह द्वितीय
● प्रधानमंत्री-: हीरालाल शास्त्री।

● षष्ठम चरण-'राजस्थान संघ'(जनवरी,1950)-:
● संयुक्त वृहत्तर राजस्थान में आबू व दिलवाड़ा को छोड़कर शेष सिरोही को मिला दिया गया।
● राजधानी-: जयपुर
● महाराजप्रमुख-: उदयपुर महाराणा भोपालसिंह
● राजप्रमुख-: जयपुर महाराजा मानसिंह द्वितीय
● प्रधामंत्री-: हीरालाल शास्त्री।

● सिरोही विलय की समस्या-:
● सिरोही के विलय में समस्या ये आयी कि माउंट आबू सहित सिरोही का एक भाग गुजरात प्रान्त में मिला दिया और हाथल जो की गोकुल भाई भट्ट की जन्मस्थली सहित सिरोही को राजस्थान में मिला दिया गया।
●  इससे गोकुल भाई भट्ट नाराज हुए तब हीरालाल शास्त्री ने कहा कि हम गोकुल भाई के बिना राजस्थान नही चला सकते।
● सिरोही में आंदोलन हुए और केंद्र सरकार ने आश्वासन दिया की इस निर्णय पर पुनर्विचार होगा।
● बाद में राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश पर माउंट आबू वाला भाग पुनः राजस्थान में मिला दिया गया।

● सप्तम चरण-'राजस्थान'(1 नवम्बर,1956)-:
● 1 नवम्बर 1956 को राजस्थान अस्तित्व में आया। राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश पर राजस्थान को अंतिम रूप दिया गया।
● सिरोही की आबू व दिलवाड़ा तहसीलें, मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले की मानपुरा तहसील का सुनील टप्पा व अजमेर मेरवाड़ा क्षेत्र राजस्थान मिला दिया गया।
● 1 नवम्बर को "राजस्थान स्थापना दिवस" के रूप में मनाया जाता है।
● इसी दिन 7 वें संविधान संशोधन के तहत "राजप्रमुख" पद को समाप्त कर "राज्यपाल" पद को सृजित किया गया।
● राज्यपाल-: गुरुमुख निहाल सिंह
● राजधानी-: जयपुर
● मुख्यमंत्री-: मोहनलाल सुखाड़िया

                                         4. महत्वपूर्ण बिंदु-:

बीकानेर नरेेेश सार्दुलसिंह "इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन" हस्ताक्षर करने वाले प्रथम राजा थे।
● जोधपुर महाराज हनुवंतसिंह ने जब मेवाड़ महाराणा भोपाल सिंह से पाकिस्तान में शामिल होने के लिए पत्र लिखा तब मेवाड़ महाराणा ने प्रत्युत्तर में लिखा कि
●"मेरी इच्छा तो मेरे पूर्वजो ने निश्चित कर दी थी। यदि वे थोड़े भी डगमगाये होते तो वे हैदराबाद जीतनी ही रियासत छोड़ जाते। उन्होंने ऐसा नही किया और न मैं करूँगा। मैं हिंदुस्तान के साथ हूं।"
● जब ब्रिटिश सरकार ने भारत की आजादी की घोषणा की तब जयपुर सबसे पहली रियासत थी जिसने भारतीय संघ में शामिल होने की घोषणा की।
● दो रियासत जोधपुर और धौलपुर को छोड़ सभी की सहमति भारतीय संघ में शामिल होने पर मिल चुकी थी।
● वी. पी. मेनन की पुस्तक " द स्टोरी ऑफ़
इंटीग्रेशन ऑफ़ इंडियन स्टेट्स" में लिखा की जिन्ना और मुस्लिम लीग के नेताओ की जोधपुर नरेश से कई मुलाकातें हुई थी। लेकिन जोधपुर की प्रजा का मत स्पष्ट था। जागीरदार और सरदार लोग जोधपुर का विलय भारत संघ में चाहते थे। बाद में सरदार पटेल और मेनन ने महाराज को समझाया और उनकी शर्ते स्वीकार की तब जोधपुर रियासत का विलय भी भारत संघ में हो गया।
● धौलपुर के महाराजा को पता चला की जोधपुर की सहमति भारत संघ के लिए मिल चुकी है तो उन्होंने भी भारत संघ में अपनी रियासत को मिलाने पर सहमति दे दी।
● धौलपुर अंतिम रियासत थी जिसने अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर किये।

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